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जसप्रीत बुमराह और एमएस धोनी की ही क्यों? घनघोर अंधेरे को चीरने वाले मोहित शर्मा भी रोल मॉडल हैं!

क्रिकेट खेल के मैदान में अक्सर दिग्गजों को ही क्यों आदर्श मान लिया जाता है? युवा खिलाड़ी हो या फैंस, हर किसी को महेंद्र सिंह धोनी, विराट कोहली या जसप्रीत बुमराह से प्रेरणा लेने की बात कही जाने लगती है और इसमें कुछ गलत भी नहीं है। आखिर हर कोई इस दुनिया में कामयाब होना चाहता है और हर कोई कामयाबी के सबसे बड़े रोल मॉडल में ही अपनी कहानी को नई दिशा देना चाहता है।

सफलता के बाद असफलता और नाकामी से उबरकर कमबैक

लेकिन, नाकामी के दौर में कैसे खुद को संभाला जाय और वापसी की जाए, ये भी काफी अहम होता है। फर्श से अर्श पर पहुंचने के बाद जब कोई फिर फर्श को स्पर्श करता है तो वहां से वापसी करना अंधेरे को चीरने के बराबर होता है। ऐसे हालात में ज्यादातर लोग या तो नशे का शिकार हो जाते हैं, गुमनामी को कबूल कर लेते हैं या फिर कोई बहुत ज्यादा निराश होकर खुदकुशी का रास्ता भी चुन लेते हैं। कामयाब होने के बाद जब नाकामी मिलती है तो उसे झेलना हर किसी के बूते की बात नहीं होती है और इसलिए आज के दौर में जीवन के हर क्षेत्र में मेंटल हेल्थ यानी कि अपने मन को हमेशा दुरुस्त रखने की वकालत की जा रही है।

मोहित शर्मा के संघर्ष की कहानी कमबैक करना सिखाती है

इसी संदर्भ में गुजरात टाइटंस के गेंदबाज मोहित शर्मा रॉल मॉडल हैं। करीब दो साल तक आईपीएल में एक भी मैच नहीं खेलने वाले मोहित शर्मा ने अपनी टीम गुजरात के लिए इस साल पहला मैच जब खेला तो वो मैन ऑफ द मैच बने। लेकिन, मीडिया में मैन ऑफ द मैच से ज्यादा चर्चा रही कि वो पिछले साल नेट बॉलर थे। दरअसल, सही मायनों में देखा जाए तो मैन ऑफ द मैच से बड़ी बात थी मोहित का नेट बॉलर बनना। आखिर हममें से कितने लोगों में ये दम होता कि भारत के लिए वर्ल्ड कप (ऑस्ट्रेलिया में 2015) खेलने का या फिर 2014 में आईपीएल में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज होने के बावजूद अपने अहम को अहमियत नहीं देना?

कभी 6.5 करोड़ कमाते थे, फिर जीरो और उसके बाद की वापसी

इस साल मोहित शर्मा गुजरात के लिए सिर्फ 50 लाख की बेस प्राइस में खेल रहे हैं और एक वक्त ऐसा भी रहा है जब वो 6.5 करोड़ रुपये सालाना भी आईपीएल से कमाई कर चुके हैं। मोहित भी मध्य-वर्गीय परिवार से आते हैं और उनके लिए आसान रास्ता होता कि वो आराम से घर पर बैठते या फिर किसी भी चैनल में कमेंट्री कर रहे होते। लेकिन, मोहित ने बेहद मुश्किल रास्ता चुना। उन्होंने खुद को कहा कि उनको क्रिकेट खेलने से लगाव है और अगर इसका मतलब नेट पर ही गेंदबाजी करना है तो वही सही और इसलिए गुजरात के कोच आशीष नेहरा के कहने पर वो पिछले साल इस भूमिका में भी खुद को सहज महसूस करते रहे।

पूरे मामले को कुछ यूं समझिए

अगर मैं मीडिया के फील्ड का उदाहरण दूं तो एक बार जब आप स्थापित रिपोर्टर बन जाते हैं तो फिर दोबारा इंटर्नशिप के बारे में सोच भी नहीं सकते। अगर राजनीति का उदाहरण दूं तो एक बार सांसद बनने के बाद आप फिर से एक सामान्य कार्यकर्ता बनने के बारे सोच भी नहीं सकते। हर अलग-अलग फील्ड में आप ऐसी तुलना कर सकते हैं। लेकिन, मोहित ने अपवाद के तौर पर ये साबित किया है कि जिस पेशे को आप पसंद करते हैं, जिसकी पहली सीढ़ी को छूते हुए आपने शीर्ष को भी देखा है तो कभी जिंदगी के सफर में फिर से पहली सीढ़ी को छूने की नौबत आए तो उससे परहेज क्यों? आखिर फिर से फर्श से अर्श पर पहुंचने का सपना तो देखा जा सकता है जो मोहित ने इस साल मैन ऑफ द मैच लेने के बाद किया है।

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