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ऐतिहासिक केशवानंद भारती जजमेंट के 50 साल, एक ऐसा फैसला जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट के 3 जजों ने एक साथ दे दिया इस्तीफा

नई दिल्ली : केशवानंद भारती केस में आए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के 50 वर्ष पूरे हो गए हैं। इसी फैसले में शीर्ष अदालत ने संसद को मूलअधिकार समेत संविधान के मूल ढांचे में किसी भी तरह के बदलाव से रोक दिया था। सोमवार को इस फैसले की 50वीं वर्षगांठ पर सुप्रीम कोर्ट ने इससे जुड़े सभी रिकॉर्ड को अपनी वेबसाइट पर अपलोड किया। शीर्ष अदालत के 13 जजों की अबतक की सबसे बड़ी बेंच ने ये फैसला सुनाया था। वेबसाइट पर बेंच के सदस्यों के दिए 11 अलग-अलग राय को भी अपलोड किया गया है।

केशवानंद भारती केस की सुनवाई 13 जजों की संविधान पीठ ने की थी। बेंच में तत्कालीन सीजेआई एसएम सिकरी के अलावा जस्टिस जेएम शेलत, केएस हेगड़े, एएन ग्रोवर, एएन रे, पीजे रेड्डी, डीजी पालेकर, एचआर खन्ना, केके मैथ्यू, एमएच बेग, एसएन द्विवेदी, बीके मुखर्जी और वाईवी चन्द्रचूड़ शामिल थे। केंद्र सरकार को संविधान के 368 के तहत संविधान संशोधन का अधिकार असीमित है या नहीं, इस पर बेंच के जजों की राय जबरदस्त तौर पर बंटी हुई थी। 7-6 के बहुमत से सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि आर्टिकल 368 के तहत ‘केंद्र को जो संशोधन के अधिकार मिले हैं उसमें संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर यानी बुनियादी ढांचा में बदलाव का अधिकार नहीं है ताकि उसकी पहचान न बदले।’

‘बुनियादी ढांचा सिद्धांत’ के पक्ष में सीजेआई सिकरी और जस्टिस शेलत, हेगड़े, ग्रोवर, खन्ना, रेड्डी और मुखर्जी ने फैसला दिया। दूसरी तरफ जस्टिस रे, पालेकर, मैथ्यू, बेग, द्विवेदी और चंद्रचूड़ इससे असहमत थे। जस्टिस मैथ्यू के बेटे केएम जोसेफ सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज हैं वहीं जस्टिस चंद्रचूड़ के बेटे अभी सीजेआई हैं। केशवानंद केस में अपने पिता के विचारों से उलट ये दोनों संवैधानिक मामलों में ‘बुनियादी ढांचा’ सिद्धांत के प्रबल पैरोकार हैं।

जिन जजों ने ‘बुनियादी ढांचा सिद्धांत’ के पक्ष में फैसला सुनाया था उनमें से कुछ ने तब अपना पक्ष बदल लिया जब संसद के संविधान संशोधन के अधिकार पर बंदिश की बात आई। जस्टिस रे, पालेकर, खन्ना, मैथ्यू बेग, द्विवेदी और चंद्रचूड़ ने फैसला सुनाया, ‘अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन के अधिकार पर किसी तरह का अंकुश नहीं है।’

‘बुनियादी ढांचे’ वाला फैसला इंदिरा गांधी सरकार के निर्णयों की राह में बाधा बना। सरकार ने अगले ही दिन यानी 25 अप्रैल 1973 को जस्टिस रे को एक-दो नहीं बल्कि 3 जजों की वरिष्ठता को नजरअंदाज करते हुए सीजेआई सिकरी का उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया। जस्टिस शेलत, हेगड़े और ग्रोवर तीनों ही जस्टिस रे से सीनियर थे। तीनों ने ही विरोध में इस्तीफा दे दिया। 26 अप्रैल 1973 को जस्टिस रे ने सीजेआई की शपथ ली।

इमर्जेंसी के दौरान, जस्टिस खन्ना ने 28 अप्रैल 1976 को एडीएम जबलपुर केस में इकलौता असहमति वाला फैसला दिया। उन्होंने अपने फैसले में लिखा कि जीने का मूलभूत अधिकार किसी भी स्थिति में निलंबित नहीं किया जा सकता, इमर्जेंसी तक में भी नहीं। उनका असहमति वाला फैसला बाकी 4 जजों- सीजेआई एएन रे औ जस्टिस बेग, चंद्रचूड़ और पीएन भगवती के फैसले से ज्यादा चर्चित हुआ। इन चारों जजों का फैसला सरकार की राय के ही तर्ज पर था कि इमर्जेंसी के दौरान सभी मूल अधिकार निलंबित रहेंगे।

इंदिरा गांधी सरकार ने एक बार फिर प्रतिशोध की कार्रवाई की और जस्टिस खन्ना की वरिष्ठता को नजरअंदाज कर जस्टिस बेग को सीजेआई नियुक्त कर दिया। जस्टिस खन्ना ने विरोध में इस्तीफा दे दिया। 40 से ज्यादा वर्ष बाद जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने एडीएम जबलपुर केस के फैसले को बुरा कानून बताते हुए पलट दिया।

सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने सोमवार को ऐलान किया कि केशवानंद भारती जजमेंट के सभी दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर बनाए गए स्पेशल पेज पर अपलोड कर दिए गए हैं। इनमें नानी पालकीवाला समेत वकीलों की लिखित दलीलें, संबंधित पक्षों की तरफ से दिए गए दस्तावेज समेत सभी केस रिकॉर्ड शामि हैं।

सीजेआई ने सुप्रीम कोर्ट में जजों के लिए एक नई लाइब्रेरी का उद्घाटन किया जिसमें कुल 3.8 लाख किताबों और संदर्भ सामग्रियों में से 2.4 लाख को शिफ्ट किया गया है।

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