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एक लाख से ज्यादा स्कूल में केवल 1 टीचर, कैसे सुधरेगी भारत की शिक्षा व्यवस्था

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने 2023-24 के बजट में शिक्षा क्षेत्र के लिए 1.13 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए, जिससे स्कूलों और उच्च शिक्षा पर अनुमानित खर्च 2022-23 की तुलना में 8.3 फीसदी बढ़ गया है। लेकिन हाल ही में संसद में सवालों के जवाब में पता चला कि भारत में अभी भी शिक्षा का हाल ठीक नहीं है। अभी इसमें काफी सुधार की जरूरत है। छात्र-शिक्षक अनुपात और एक टीचर वाले स्कूलों की संख्या प्रशिक्षित अध्यापकों की कमी के गंभीर मुद्दे की ओर इशारा करती हैं। इसके अलावा देशभर में एक ओर जहां डिजिटल इंडिया की बात हो रही है वहीं लाखों स्कूल अभी तक इंटरनेट कनेक्टिविटी से दूर हैं।

देश में सबसे खराब छात्र-शिक्षक अनुपात वाले राज्यों में सबसे बड़ी आबादी या हाई जनसंख्या घनत्व वाले राज्य हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार छात्र-शिक्षक अनुपात के मामले में सबसे खराब स्थिति में हैं। ये न केवल देश में सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य हैं, बल्कि सबसे गरीब राज्यों में भी हैं। इसके विपरीत कम आबादी वाले राज्यों में छात्र-शिक्षक अनुपात ठीक है। लेकिन कम छात्र-शिक्षक अनुपात के बावजूद, हरियाणा, पश्चिम बंगाल और दिल्ली जैसे राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर है।

अकेले मध्य प्रदेश में 16,000 से ज्यादा एक टीचर वाले स्कूल

भारत के लगभग 8 फीसदी स्कूलों में केवल एक शिक्षक है। ज्यादा आबादी वाले राज्यों में भी एक शिक्षक वाले स्कूलों की संख्या कम नहीं है। उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश में प्राइमरी स्कूलों में छात्र-शिक्षक अनुपात 25 है। ये आरटीई एक्ट द्वारा अनिवार्य स्तर से बेहतर जरूर है, लेकिन इसी राज्य में सबसे ज्यादा एक टीटर वाले स्कूल हैं। बड़े राज्यों में केरल में 310 स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक शिक्षक हैं।

देशभर के एक चौथाई से कम स्कूलों में इंटरनेट

शिक्षा को डिजिटाइज करने पर जोर देने के बावजूद भारत में चार में से एक से भी कम स्कूलों में इंटरनेट की सुविधा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस साल के केंद्रीय बजट में राष्ट्रीय डिजिटल लाइब्रेरी कार्यक्रम और पिछले साल राष्ट्रीय डिजिटल विश्वविद्यालय कार्यक्रम की घोषणा की थी ताकि
लर्निंग आउटकम में सुधार किया जा सके और महामारी से संबंधित लर्निंग की भरपाई की जा सके। लेकिन 29 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में, आधे से भी कम स्कूलों में इंटरनेट की सुविधा है, जो इस तरह के डिजिटल कार्यक्रमों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

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