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तानसेन के कुल से आया है हमारा संगीत, पढ़िए शास्त्रीय गायक प्रेम कुमार मल्लिक का पूरा इंटरव्यू

नई दिल्ली: बिहार के दरभंगा घराने से जुड़े शास्त्रीय गायक प्रेम कुमार मल्लिक को पिछले दिनों राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 2019 के केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया है। पंडित प्रेम कुमार मल्लिक इलाहाबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के संगीत विभाग में सीनियर प्रफेसर हैं, जिनकी ख्याति मुख्य रूप से ध्रुपद गायन के क्षेत्र में रही है। ध्रुपद जैसी बेहद गंभीर शास्त्रीय गायन शैली के साथ-साथ उन्हें ख्याल, ठुमरी, टप्पा और दादरा गायन में भी महारत हासिल है। उनसे बात की अमितेश कुमार ने। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश :

  1. आपका दरभंगा घराने से आते हैं। इस घराने की किस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं आप
    संगीत में मेरी यात्रा लगभग 50 साल की है। करीब 8 साल की उम्र से मैं मंच पर प्रदर्शन करता आ रहा हूं। किशोरावस्था में ही संगीत की दुनिया अच्छी लगने लगी और यह हमारे घराने की परंपरा भी थी। मैं अपने घराने में बारहवीं पीढ़ी का हूं। इस यात्रा में बहुत सम्मान मिले। संगीत नाटक अकादमी सम्मान इस क्षेत्र का सबसे बड़ा सम्मान है, जो इंगित करता है कि आपने अपने क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है।
  2. आपके घराने की क्या परंपरा रही है?
    16वीं सदी के उत्तरार्ध और 17वीं सदी की शुरुआत में हमारे पूर्वजों ने तानसेन के भतीजे (उस्ताद भूपत खान साहब) से शिक्षा ली। भूपत जी शुजाउद्दौला के दरबारी कवि थे। भूपत जी ने अपने शिष्य (हमारे पूर्वजों) को उनके सामने गाने को कहा। संयोग से उस समय दरभंगा के राजा वहां मौजूद थे। उन्होंने हमारे पूर्वजों से दरभंगा चलने और मेघ-मल्हार गाकर पानी लाने का आग्रह किया। हमारे पूर्वज दरभंगा गए, वहां राग मल्हार गाया और जलवृष्टि की। उसके बाद वे दरभंगा में बस गए। उन्हें कुछ गांवों का मालिकाना मिल गया और वे मल्लिक कहलाने लगे। हमारे घराने की विशेषता है कि हम भजन, ठुमरी आदि भी उतनी ही कुशलता से गा सकते हैं। हमारे यहां चारों पट की गायकी- ध्रुपद, ख्याल, ठुमरी, दादरा और भजन है। हम लोक संगीत को भी ध्रुपद शैली में बांधकर गाते हैं। हमारे पूर्वजों ने परंपरा से इस कला को संजोए रखा है। आधुनिक दौर में हम जनता की चित्तवृत्ति के अनुसार परिवर्तन कर रहे हैं। लेकिन हम राग की शुद्धता का पूरा ध्यान रखते हैं। ध्रुपद जैसी परंपरागत गायन शैली की मौलिक विशेषताओं, जैसे आलाप का विशेष ध्यान रखा जाता है।
  3. ध्रुपद जैसी परंपरागत गायन शैली सीखने जो युवा पीढ़ी आ रही है, उसे लेकर आप क्या सोचते हैं?
    आज के बच्चे उतने परिश्रमी नहीं हैं, जितने पहले होते थे। कुछ तो कोरोना काल ने लोगों को शिथिल कर दिया। इसके कारण दूरस्थ शिक्षा की आदत हो गई है। सॉफ्टवेयर जनित शिक्षा से छात्रों को समझना मुश्किल होता है और समझाना भी। यह आमने-सामने सीखने की कला है। गायन की इन शैलियों को सीखने के लिए गुरु के पास बैठ कर रियाज करना जरूरी है। ध्रुपद गायन और ध्रुपद श्रवण में धैर्य होना आवश्यक है। जिनके पास बहुत समय है, उन्हें मैं विधिवत सिखा सकता हूं पर उसके लिए धैर्य चाहिए।
  4. क्या आपको लगता है कि ध्रुपद जैसी कला के लिए समाज में धीरज कम होता जा रहा है?
    आज के लोगों का स्वाद अब बदल गया है। कुछ तो फिल्म संगीत का प्रभाव है। भारतीय संगीत अपनी जगह पर है, लेकिन युवा पीढ़ी का रुझान बहुत हलके संगीत की ओर है। युवा पीढ़ी समय भी नहीं देना चाहती। अगर युवा समय देंगे तो कोई भी चीज असंभव नहीं है। जिसके गले में सुर है, फिल्मी गाना गा सकता है तो हर चीज गा सकता है। हमारे यहां तीन चीजें मुख्य हैं- सुर, लय और ताल। लय हमारे जीवन में हर जगह पर है, उसकी एक गति होती है। सांसों की धड़कन भी एक लय है। जिसे कुछ नहीं मालूम है, उसे संगीत सीखने के लिए संगीत के वातावरण को अपनाना पड़ेगा, संगीत संगोष्ठी में समय देना पड़ेगा। कहते हैं कि तानसेन तो सब नहीं बन सकते, पर कानसेन तो बन सकते हैं। कम से कम सुर, ताल और लय का ज्ञान धैर्य से अर्जित करना पड़ेगा।
  5. हिंदी भाषी क्षेत्रों में ध्रुपद जैसी कला को समाज के बीच पहुंचाने में आपने क्या मुश्किलें झेली हैं और उनका क्या समाधान है?
    बिहार और यूपी में आज भी पुरानी कला की कद्र है। खासकर अध्यात्म की जगहों पर जैसे अयोध्या, बनारस या इलाहाबाद है। विश्वविद्यालय की भी बहुत सी शाखाएं हैं। इसमें संगीत है, लेकिन समाज तो तभी संगीत की कद्र करेगा, जब वह संगीत के वातावरण में बैठता हो। इसके बिना आम संगीत सुनना मुश्किल होगा, फिर ध्रुपद तो बहुत कठिन चीज है। इसके लिए धैर्य की जरूरत है। प्योर संगीत सीखने के लिए उस वातावरण में बैठना पड़ेगा।
  6. क्या ध्रुपद गायन परंपरा में कुछ राग खतरे में हैं?
    नहीं, राग खतरे में नही हैं बल्कि और नवीन रागों में कल्पना हो रही है। पहले कुछ खास बड़े राग (दरबारी, बिहार बागेश्वरी, शुद्ध कल्याण, अहीर भैरव) होते थे। सुर कल्याण, भोपाली, यमन अहीर भैरव आदि जो संपूर्ण जाति का राग होते थे, उनमें ज्यादा ध्रुपद सुनाई देता था, जैसे मालकौंस। जैसे हमारे छह प्राचीनतम राग हैं, जिनकी छत्तीस रागिनियां मानी गई हैं। भैरव, मालकौंस, हिंडोल, श्री, दीपक, मेघ- इन छह रागों की छत्तीस रागिनियां है। वह भी राग के नाम से संबोधित होती हैं। रागिनी मतलब उन रागों की स्त्रियां, परंतु वर्तमान समय में सब राग के नाम से जाना जाता है चाहे वह छोटा राग हो या बड़ा राग। छोटे राग से मतलब प्योर चीज है। वह कभी ना समाप्त हुआ है और ना होगा।

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