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नृत्यों में खिले फागुन और बसंत

विश्व प्रसिद्ध खजुराहो के मंदिर फागुन के दिलकश मौसम में खुद पर फूले नहीं समा रहे। खजुराहो नृत्य समारोह ने इन मंदिरों की ख़ूबसूरती में मानो सितारे लगा दिए हों। जगदम्बी और कंदरिया महादेव के मंदिरों के बीच बने विस्तीर्ण मंच पर जब नर्तक और नर्तकियाँ नृत्यरत होती हैं, तो लगता है मंदिरों के पत्थरों में उकेरी गईं प्रेम प्रतिमाएँ अपना स्थान छोड़कर नृत्य करने आ गई हैं। हर दिन ऐसी ही अनुभूति लोग महसूस करते हैं। तीसरे दिन भी ऐसा ही अनुभव रसिकों ने किया। बसंत ओर फागुन मानो यहाँ बहार और होली गाने आए हों, सचमुच ऐसी ही अनुभूति हुई जब प्रतिशा, हिमांशी कटरगड्डा, आरती नायर और कदम्ब सेंटर फॉर डांस के नर्तक मंच पर अवतरित हुए। 

समारोह के तीसरे दिन का आगाज़ प्रतिशा सुरेश के सत्रीया नृत्य से हुआ। सत्रीया लगभग 500 साल पुरानी शास्त्रीय नृत्य शैली है। प्रतीशा ने कृष्ण के वृन्दावन आगमन पर गोपियों के साथ प्रकृति के भी प्रसन्न होने के भावों को बड़े ही सहज ढंग से नृत्य में समाहित किया। समारोह में श्री कृष्ण के विराट रूप की प्रस्तुति भी दी गई। इसे असमिया महाभारत के भीष्मपर्व से लिया गया था। युद्ध के मैदान में जब अर्जुन अपनों को देख कर हताश होते है तब श्रीकृष्ण उन्हें अपना विराट रूप दिखाते हैं और उपदेश देते हैं। इस कथा को प्रतीशा ने बड़े ही मनोयोग से विभिन्न भाव भंगिमाओं के साथ प्रस्तुत किया। इन प्रस्तुतियों में संगीत की धुरा बाना, थियो पाटन आदि शैलियों का प्रयोग किया गया। इसमें गायन में धीरेंद्र सेकनिधारा, बाँसुरी पर भास्करजीत फुकन, सरिन्दा पर गोविंद डे औऱ ताल पर हेमंत फुकन ने साथ दिया। 

दूसरी प्रस्तुति में हिमांसी कटरगड्डा एवं आरती नायर के कुचिपुड़ी और भरतनाट्यम नृत्य की जुगलबंदी पेश की। दोनों ने आदि शंकराचार्य कृत अर्धनारीश्वर स्त्रोतम पर अपनी प्रस्तुति दी। कर्नाटक शैली के विभिन्न रागों की रागमालिका और ताल मलिका में आबद्ध यह प्रस्तुति अभिभूत करने वाली थी। भगवान शंकर अर्धनारीश्वर रूप में आधे भाग में शिव और आधे में पार्वती के रूप में हैं, जो शिवशक्ति का ही रूप है इस रूप से शिव ने ब्रह्माजी को प्रजनन शील प्राणी के सृजन की प्रेरणा दी। हिमांसी एवं आरती ने इसे अपने उदात्त नृत्यभिनय और आंगिक गतियों से बखूबी निभाया। प्रस्तुति का संगीत संयोजन श्वेता प्रसाद ने किया था।

आरती एवं हिमांसी की अगली प्रस्तुति जयदेवकृत अष्टपदी थी। इसमें दोनों ने राधा-कृष्ण के प्रेम के उदात्त स्वरूप को अपनी भाव-भंगिमाओं से प्रस्तुत किया। राधा को सखियाँ एक स्थान पर छोड़ गईं, वह कृष्ण के प्रेम में डूबी हैं, कृष्ण आते है और राधा से प्रेमपूर्वक बातें करते हैं। आदि ताल में निबद्ध इस प्रस्तुति में भी दोनों ने अंग और पद संचालन के साथ खूब रंग भरे। नृत्य का समापन तरंगम से हुआ। “जय-जय दुर्गा देवी…” रचना पर नृत्य की प्रस्तुति हुई, जिसमें थाली की किनारी को पैरों में फँसा कर ताल के साथ लय मिलाते हुए पद संचालन किया गया। इसमें संगीत संयोजन श्वेता प्रसाद और नृत्य संयोजन बी सुधीर रॉ गारू का था। 

तीसरे दिन की सभा का समापन कदम्ब सेंटर फॉर डांस के कलाकारों की कथक प्रस्तुति से हुआ। ग्रुप में रूपांशी कश्यप, मिताली ध्रुव, मानसी मोदी, अभिषेक खींची, निर्जरी व्यास,वैष्णवी वकील, सुनिधि गेमावत, और धारा बनेरा शामिल थी। नृत्य की शुरूआत उपज से हुई। इस प्रस्तुति में नर्तकों ने कई पैटर्न बुने। भारत की स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में सुवर्णा पर नृत्य प्रस्तुत किया गया। ब्रह्मानंद की रचना- श्याम सलोना पर इन कलाकारों ने बेहतरीन प्रस्तुति दी। नृत्य का समापन तराना में विभिन्न लयकारियों के प्रदर्शन के साथ हुआ।

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