नई दिल्ली: बहुमत वाली सरकार और कई दलों को साथ लेकर चलने वाली गठबंधन सरकार का फर्क भारत के लोग समझ चुके हैं। कई दलों वाली ‘खिचड़ी’ सरकार में फैसले लेना आसान नहीं होता, इसी तरह से बहुपक्षीय संगठन में आम सहमति बनाना मुश्किल होता है। जी-20 देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक दिल्ली में हुई, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में मतभेद भुलाकर वैश्विक चुनौतियों के लिए काम करने की अपील की लेकिन दो देश अलग ही लाइन पर खड़े हो गए। नतीजा यह हुआ कि साझा बयान पर सहमति ही नहीं बन पाई। मुद्दा बना यूक्रेन संकट और यह प्रतिष्ठित समूह दो गुटों में बंटा दिखा। एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देश तो दूसरी तरफ रूस-चीन अलग खड़े रहे। पिछले दिनों जी-20 के वित्त मंत्रियों की बैठक में भी साझा बयान सामने नहीं आया था। लगातार दो मंत्रिस्तरीय बैठकों में आम सहमति न बन पाने से आगामी बैठकों और इसी साल सितंबर में होने वाले शिखर सम्मेलन को लेकर भी सवाल खड़े हो गए हैं। एक तरफ है अमेरिका और उसके सहयोगी देश तो दूसरी तरफ रूस-चीन का गठजोड़ है।
- यह मेजबान भारत के प्रयासों की कमी नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देशों के बीच बढ़ते मतभेद का नतीजा है – संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस के प्रवक्ता
2 पैरे पर अटक गई सारी बात
दरअसल, दस्तावेज में यूक्रेन संघर्ष पर दो पैराग्राफ थे। रूस और चीन को छोड़कर सभी देश इस पर सहमत हुए। ये दो पैराग्राफ जी-20 के बाली सम्मेलन के घोषणापत्र से लिए गए थे। इनमें से एक पैराग्राफ में अंतरराष्ट्रीय कानून और बहुपक्षीय प्रणाली को कायम करने की बात कही गई है कि जो शांति और स्थिरता को सुरक्षा प्रदान करते हैं। इसमें कहा गया, ‘परमाणु हथियारों का उपयोग या इस्तेमाल की धमकी अस्वीकार्य है। संघर्षों का शांतिपूर्ण समाधान, कूटनीति और संवाद महत्वपूर्ण है। आज का युग युद्ध का नहीं होना चाहिए।’ बैठक में आतंकवाद की खुलकर निंदा की गई। जयशंकर ने कहा, ‘हमारी कोशिश है कि ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज सुनी जाए।’
रूस-चीन बोले, हम हस्ताक्षर नहीं करेंगे
ब्लिंकन ने बताया, ‘रूस और चीन ने साफ कह दिया कि वे हस्ताक्षर नहीं करेंगे।’ अमेरिकी मंत्री ने कहा कि जी-20 के लिए भारत के एजेंडे का अमेरिका खुलकर समर्थन करता है। साथ ही अमेरिका यूक्रेन का सहयोग करता रहेगा। जी-20 की बैठक में प्रधानमंत्री मोदी के बयान का जिक्र करते हुए अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा कि उनकी बात सही है कि बहुपक्षीय प्रणाली में चुनौतियां होती हैं। ब्लिंकन ने कहा, ‘कई मायनों में ये चुनौतियां सीधे रूस से आ रही हैं।’