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माफी सलमान रुश्दी ने मांगी, मैंने नहीं… तस्लीमा नसरीन को क्‍यों मिल रहीं अल्लाह से माफी मांगने की नसीहतें

बांग्लादेश मूल की चर्चित लेखिका तस्लीमा नसरीन विवादों से घिरी रही हैं। अपनी बेबाक लेखनी से वह धार्मिक कट्टरता, उन्माद पर प्रहार करती रही हैं। अपने देश से निर्वासित होने के बाद तस्लीमा फिलहाल भारत में हैं। पिछले दिनों भी उन्हें लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह की अफवाहों का बाजार गर्म रहा। ऐसे में उनसे बात की अर्चना शर्मा ने। पेश हैं बातचीत के अहम अंश :

जैसा कि आप देख रही हैं कि मैं बिस्तर पर हूं और काफी तकलीफ में हूं। जनवरी के दूसरे हफ्ते एक दिन मैं अचानक लड़खड़ा कर गिरी और घुटने में चोट आ गई। अस्पताल गई, जहां मैं एक गंभीर मेडिकल क्राइम का हिस्सा बन गई। मेरा जो ऑपरेशन हुआ उसकी वजह से मैं बिस्तर पर कैद होकर रह गई हूं। इस घटना ने मुझे शारीरिक कष्ट के साथ काफी मानसिक पीड़ा दी है। मुझे नहीं मालूम कि मैं कब तक ठीक हो पाऊंगी।

धार्मिक कट्टरपंथियों को आपने हमेशा चुनौती दी है। क्या वक्त के साथ उनसे बैर कुछ कम हुआ या नहीं?

कट्टरपंथियों की नफरत समय के साथ और भी बढ़ती जा रही है और ये ज्यादा खतरनाक होते जा रहे हैं। हाल में मैंने सोशल मीडिया पर जब लिखा कि किस तरह गलत इलाज की वजह से मैं बिस्तर पर आ गई तो इनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वे मेरे फेसबुक पेज और ट्विटर पर मेरा गलत ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर को बधाई देने लगे। उनके हिसाब से अल्लाह ने मुझे मेरे गुनाहों की सजा दी है। साथ ही मुझे अल्लाह से माफी मांगने की ढेरों नसीहतें दे रहे हैं।

इस्लाम में किन तब्दीलियों को आप जरूरी मानती हैं?

हर धर्म में कई ऐसी बातें हैं जो महिलाओं के खिलाफ हैं, लेकिन धर्म में बदलाव ला पाना तो मुमकिन नहीं है। इस्लाम, ईसाई और यहूदी धर्म की बुनियादी बातों में ज्यादा फर्क नहीं है। समय के साथ ईसाई मत में धर्म और सरकार के मामले अलग हो गए, पर इस्लाम के साथ ऐसा नहीं हुआ। वह आज भी अपने प्राचीन स्वरूप में है। यही परिस्थिति धार्मिक कट्टरता और जिहाद को बढ़ावा देती है। मध्ययुगीन दुनिया में ईसाई मत की खिलाफत करने पर लोगों की हत्या कर दी जाती थी पर आज ऐसा नहीं है। मगर इस्लाम में आज भी यह स्थिति बरकरार है, धर्म का विरोध दंडनीय है। धर्म किसी भी व्यक्ति का अपना चुनाव होना चाहिए। उस पर किसी तरह का दबाव नहीं होना चाहिए और ना ही उसे थोपा जाना चाहिए। मैं इस्लाम या किसी भी धर्म के खिलाफ नहीं हूं, पर मेरा मानना है कि मुसलमानों में एक प्रगतिशील सोच होनी चाहिए। वे जिहाद के रास्ते पर ना चलें और अच्छे इंसान बनें। मुस्लिम समुदाय में भी कई तरह की असुरक्षा और डर का माहौल है, इसलिए वे आपस में भी झगड़ते रहते हैं। धार्मिक कट्टरपंथ को दूर करना निहायत जरूरी है।

लज्जा की लेखिका से लेकर आज की सोशल मीडिया पर मुखर, हलचल मचाने वाली तस्लीमा नसरीन का सफर कैसा रहा है?

मैं हमेशा से बहुत बहादुर रही हूं। ‘लज्जा’ के प्रकाशन के बाद कट्टरपंथियों का कड़ा प्रहार झेला। देश भी छोड़ना पड़ा। मगर मैं घबराई नहीं, क्योंकि मेरे अंदर किसी भी तरह के अत्याचार या भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं थी। महिलाओं की स्थिति और अधिकारों को लेकर मैं काफी संवेदनशील रही हूं। धनी और निर्धन के बीच की असमानता मिटे, चारों तरफ खुशहाली और तरक्की का माहौल हो। मैं एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती हूं, जो शायद यूटोपियन हो, लेकिन मैं ऐसा ही सोचती हूं। ऐसे बदलाव के लिए संघर्ष का रास्ता काफी कठिन और लंबा है, यह मैं बखूबी समझती हूं। प्रतिबंध लगने के बावजूद मैंने अपने लेखन से किसी तरह का कोई समझौता नहीं किया और ना ही कभी खामोश रही।

जो अपना घर छोड़ दे उसकी नियति बंजारा है। आपने इस बंजारा नियति को स्वीकार कर अपने आपको कैसे संभाला?

मैं बांग्ला भाषा की लेखिका हूं पर ना तो मैं बांग्लादेश में रह सकती हूं और ना ही भारत के पश्चिम बंगाल राज्य में। यह बात मेरे लिए बहुत कष्टप्रद है। वैसे मेरे पास स्वीडेन और अमेरिका की नागरिकता है पर भाषाई, सांस्कृतिक जुड़ाव की वजह से भारत से मुझे प्यार है। यहां मेरे लेखन को खाद-पानी मिलता है। अपना घर, अपनी जगह को छोड़ना कोई आसान बात नहीं, पर जीवन में जिस उद्देश्य को मैंने चुना है उसके साथ मिलने वाली चुनौतियों को भी मैंने स्वीकारा है। इतिहास साक्षी है कि जिन लेखकों ने सचाई बयान की, सरकारी तंत्र पर प्रहार किया या कट्टरपंथ को चुनौती दी, उन्हें बहुत सी मुश्किलों को झेलना होता है। बांग्लादेश या दुनिया के कई देशों में कितने ही लेखक या तो कारावास में हैं या फिर नजरबंद हैं या उन्हें मृत्युदंड मिला। यह बहुत बड़ी बात है कि मैं जीवित हूं और सच के रास्ते पर चल रही हूं।

सलमान रुश्दी और आपके लेखन में समानता सी दिखती है। क्या आप इस विचार से सहमत हैं?

मुझे नहीं लगता कि मेरे और सलमान रुश्दी के लेखन में किसी भी तरह का साम्य है। सलमान रुश्दी फिक्शन लिखते हैं और मैं नॉन फिक्शन लिखती हूं। मेरा लेखन महिला अधिकारों की हिमायत करता है जबकि उनके लेखन में ऐसा नहीं है। मैं धर्म की आलोचनात्मक व्याख्या करती हूं, जो सलमान अपने लेखन में नहीं करते। मैंने आज तक जो भी लिखा उसके लिए कभी क्षमा याचना नहीं की, लेकिन सलमान के लिखे का विरोध होने पर उन्होंने क्षमा याचना की और बयान जारी किया। इसलिए यह तुलना गलत है।

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